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बेंगलुरु में मजदूरी कर रहा था ओडिशा का शुभम, तभी आया फोन- 'तुम डॉक्टर बनने जा रहे हो!'

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डॉक्टर बनने का सपना हर किसी का हो सकता है, लेकिन NEET जैसे कठिन एग्जाम को पास करना कोई आसान बात नहीं। और अगर ये सपना कोई गरीब परिवार का बच्चा पूरा कर ले, जो आर्थिक तंगी से जूझ रहा हो, तो ये कहानी और भी खास बन जाती है। ओडिशा के आदिवासी युवक शुभम सबर ने ऐसा ही कमाल कर दिखाया है।

19 साल के शुभम का डॉक्टर बनने का सपना अब हकीकत बन चुका है। लेकिन इस सपने तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं था। आइए, जानते हैं उनकी प्रेरणादायक कहानी।

मजदूरी के बीच मिली खुशखबरी

14 जून का वो दिन शुभम के लिए कभी न भूलने वाला था। वो बेंगलुरु की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर पसीना बहा रहे थे। दिनभर की मेहनत के बाद भी कई घंटे काम बाकी था। तभी उनके पास एक फोन आया, जिसने उनकी जिंदगी बदल दी। फोन उनके ओडिशा के टीचर बासुदेव मोहराणा का था। उन्होंने खुशी से चिल्लाते हुए बताया, “शुभम, तुमने NEET-UG पास कर लिया है!”

शुभम ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया,
“मैं अपने आंसू नहीं रोक पाया। मैंने तुरंत अपने माता-पिता को फोन किया और कहा कि मैं डॉक्टर बनने जा रहा हूँ। फिर मैंने अपने ठेकेदार से कहा कि मुझे अब तक की सारी कमाई चाहिए।”

इस हफ्ते की शुरुआत में शुभम को ओडिशा के बरहामपुर में मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में दाखिला मिल गया। उन्होंने पहली ही कोशिश में अनुसूचित जनजाति (ST) कैटिगरी में 18,212वीं रैंक हासिल की।

छोटे से गांव से मेडिकल कॉलेज तक

शुभम ओडिशा के खुर्दा जिले के मुदुलिधिया गांव से हैं, जहां उनके पिता एक छोटे किसान हैं। चार भाई-बहनों में सबसे बड़े शुभम ने बताया,
“मुझे अपनी आर्थिक स्थिति का अच्छे से पता था। मेरे माता-पिता के पास थोड़ी-सी जमीन है और वो हमें पालने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। लेकिन मैंने ठान लिया था कि मुझे पढ़ाई पूरी करनी है और जिंदगी में कुछ बड़ा करना है।”

शुभम ने दसवीं कक्षा में 84% अंक हासिल किए। उनके शिक्षकों ने उन्हें भुवनेश्वर के बीजेबी कॉलेज में ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई करने की सलाह दी। पहले साल शुभम ने खुद पढ़ाई की, लेकिन दूसरे साल उन्होंने मैथ्स और कैमिस्ट्री की ट्यूशन ली और बारहवीं में 64% अंक हासिल किए।

NEET की तैयारी और मजदूरी

बारहवीं के बाद शुभम ने डॉक्टर बनने का फैसला किया और बरहामपुर के एक कोचिंग सेंटर में NEET की तैयारी शुरू की। एग्जाम देने के बाद वो बेंगलुरु चले गए, जहां उन्होंने तीन महीने तक कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूरी की। इस दौरान उन्होंने 45,000 रुपये कमाए और 25,000 रुपये बचाए। ये पैसा उनके मेडिकल कॉलेज में दाखिले की शुरुआती फीस के लिए बहुत जरूरी था।

माता-पिता का गर्व और चिंता

शुभम के माता-पिता, सहदेव और रंगी, अपने बेटे की उपलब्धि पर गर्व महसूस कर रहे हैं। लेकिन वो आगे की पढ़ाई के लिए आर्थिक चुनौतियों को लेकर चिंतित भी हैं। उन्हें उम्मीद है कि सरकार उनके बेटे को MBBS पूरा करने के लिए आर्थिक मदद देगी।

प्रेरणा का स्रोत बने शुभम

शुभम की इस सफलता ने न सिर्फ उनके गांव बल्कि पूरे ओडिशा में हलचल मचा दी है। ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के राजनीतिक सचिव संतृप्त मिश्रा ने कहा,
“शुभम का सफर प्रेरणा, मेहनत और संघर्ष का एक शानदार उदाहरण है।”

चार साल बाद, जब शुभम अपनी पढ़ाई पूरी करेंगे, तो वो अपनी पंचायत के पहले डॉक्टर होंगे। उनकी कहानी हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है, जो मुश्किल हालात में भी बड़े सपने देखने की हिम्मत रखता है।

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